42 फीट के हनुमान बांसवाड़ा में

42 फीट की प्रतिमा। बरसों की मेहनत के बाद शानदार मंदिर बना। भक्तों के दानपुण्य और श्रमदान की बदौलत बांसवाड़ा शहर को वो धार्मिक स्थान मिला जैसा कम से कम वागड़ कांठल में तो नहीं है। लेकिन उपेक्षा के थपेड़ों ने उसे उजाड़ और वीरान कर दिया। विशाल प्रतिमा अब मरम्म्त की बाट जोह रही है। भक्तों को पुकार रही है। शहर के वार्ड एक के पीपलोद क्षेत्र में 42 फीट की हनुमान प्रतिमा व हनुमान मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र रही है, भक्त आते भी हैं पर मंदिर की यह दशा देख लोगों का दिल दुखता है। हनुमान जयंती के मौके पर जब पत्रिका टीम ने मंदिर के बारे में पड़ताल की तो मंदिर के गौरवशाली अतीत और मायूसी भरे वर्तमान की तस्वीर सामने आई। पेश है रिपोर्ट-

5 वर्षों में बनकर तैयार हुआ मंदिर
मंदिर के पास निवास करने वाले बुजुर्ग वीरजी मईड़ा ने बताया कि उन्हें ठीक से तारीखें तो याद नहीं पर जिस दौरान माही डेम का कार्य चल रहा था, उस दौरान ही मंदिर का निर्माण हुआ। पूरा मंदिर बनने में तकरीबन पांच वर्ष का समय लगा।

भक्तों की सहूलियत का भी महंत ने रखा था ध्यान
ग्रामीणों ने बताया कि मंदिर को बनवाने पूरा श्रेय महंत गोपालपुरी को जाता है, उनकी मेहनत के कारण ही बन पाया था। उन्होंने गुजरात, मध्य प्रदेश और न जाने कहां-कहां जाकर चंदा जुटाया था। उनकी मंशा था कि मंदिर भव्य बने। मंदिर परिसर में उन्होंने छाया पानी और ठहराव की भी व्यवस्था की थी। जो कुआं अब रखरखाव के अभाव में बंद हो चुका है।

भरता था मेला
ग्रामीण वीरजी ने बताया कि जब महंत गोपालपुरी गोस्वाती जीवित थे तब तक यहां पर खूब रौनक रहती थी, उस दौरान कई वर्षों तक यहां मेला भी भरा। उनके देहांत के बाद यहां धीरे-धीरे सब उजाड़ हो गया। अब तो पूरा मंदिर ही जर्जर हो गया।

संभाग में नहीं है इतनी बड़ी प्रतिमा कहीं नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि जहां तक जानकारी है पूरे संभाग में बजरंग बली की इतनी विशाल प्रतिमा नहीं है। मंदिर की खासियत को लेकर ग्रामीणों ने बताया कि इसमें यहां भगवान बजरंग बली की कई रूपों की प्रतिमाएं लगाई गई थीं। इसके अलावा कई सारे शिवलिंग भी स्थापित किए गए थे। साथ ही अन्य कई देवी देवताओं की प्रतिमाओं को मंदिर में स्थापति किया गया था। पर अब सबकुछ जर्जर हो गया।

किसी ने जमीन दान की तो किसी ने किया श्रमदान
क्षेत्रीय लोगों ने बताया कि मंदिर बनवाने के लिए ग्रामीणों और महंत गोपालपुरी गोस्वामी ने अथाह मेहनत की। ग्रामीण धुलजी भाई राणा ने खाते की एक बीघा जमीन दान की, जहां मंदिर बनवाया गया। मंदिर बनाने केलिए ग्रामीणों न श्रमदान भी किया।

कई बार भेजे प्रस्ताव
स्थानीय पार्षद पति विमल ने बताया कि मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए नगर परिषद में प्रस्ताव बनाकर दिए। सभापति ने मंदिर का निरीक्षण भी किया और कार्य कराने का आश्वासन भी दिया। लेकिन हाल जस के तस हैं। सडक़ भी नहीं है।

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Post Author: harshit_tailor